Monday, 18 October 2021

घिर रही है सांझ 
हो रहा अब समय 
घर कर ले उदासी। 

तौल अपने पंख, सारस, दूर के 
इस देश में तू है प्रवासी।

  - अज्ञेय   

Sunday, 13 September 2020

A TEACHER IN TIMES OF CORONA

 

I am a teacher, 
Yes, am a teacher and I remember-
Once, I was a teacher all flesh and blood,
Now, am a dunce- struggling and juggling
With so many Apps, Vlogs and all that
Zoom, Google, G suite Meet's flash flood
Desperately handling all till I collapse.

Yes, I am a teacher, and I remember-
Once, an actor, a doctor, a nurse, 
An advisor, a friend in a class.
Now, a pop-up face on a black screen
Dinky-winky like a crownless queen.
Once, my roar boomed the class
Now, some pathetic petty phrases-
"Am I audible, visible...
Can you see...
Could you mute your audio.
Please switch on your video..."

Yes, I am a teacher,
Our entity now online...
The deserted school with deafening silence
Wears the look of a fairy tale castle
And the empty playground with no footfall
Without chirpy children like the cruel 
Corona's garden with winter all around

Even then, I am a teacher,
A reincarnated soul in an online body
Reaching unknown spheres
And exploring unreachable zones
With a hope-
"If winter comes, can spring be far behind?" 
And, with this hope-
I keep going extra mile not just to be 
Some legendary or mystical creature
But because I know that 
I can't be a forgotten lore...

Yes, I am a teacher, 
And, feel proud to say-
A teacher of all times,
A teacher of all seasons.
'Dedicated to all teachers on Teacher's Day'


Sunday, 19 August 2018

हिंदी नाटक

शीर्षक - अबला या सबला 
पात्र : सात
इंद्र
रम्भा
नारद
कॉलेज के लड़के लडकियां
लेडी डॉक्टर
सास
बहु
पति
 भूमिका : "नारी जीवन तेरी यही कहानी, आँचल में दूध, आँखों में पानी।" राष्ट्रकवि मैथिलि शरण गुप्त जी की बावन वर्ष पहले लिखी ये पंक्तियाँ हमारे समाज की सोच में अंगद सा पाँव जमा कर बैठ गयी है जिससे हम अभी भी मुक्त होने के लिए जूझ रहे हैं, लड़ रहे हैं। प्रस्तुत है इसी सन्दर्भ में एकांकी 'अबला या सबला'. माननीय निर्णायक गण व दर्शक गण, जरा इस पर गौर फरमाएं- 


दृश्य १- चलें देखें जरा देवराज इंद्र की सभा में क्या चल रहा है?

(स्वर्ग में इंद्र की सभा, इंद्र सिंहासन पर विराजमान, दो सेवक चंवर डुलाते हु, रम्भा नृत्य करती हुई)

इंद्र: धन्य हो रम्भा, धन्य हो तुम्हारी नृत्य कला , मैं अतिप्रसन्न हूँ, स्वीकार करो ये पुरस्कार।
       (गले से माला देते हुए) 
रम्भा: इसकी क्या आवश्यकता प्रभु. आपकी प्रसन्नता ही मेरा पुरस्कार है।
नारद का प्रवेश: नारायण नारायण , देवराज इंद्र की जय हो!
इंद्र : पधारिये देवर्षि, आपका स्वागत है।  कहिये क्या समाचार है?
नारद: समाचार! नारायण नारायण! यहाँ तो बांटा जा रहा है पुरस्कार और वहां मचा है हाहाकार।
इंद्र: कहाँ मुनिवर?
नारद: पृथ्वी पर प्रभु।  वहां जो देखा, उससे ह्रदय द्रवित हो गया। नारायण नारायण। 
इंद्र: ऐसा क्या देखा, मुनिवर?
नारद: प्रभु, विश्व में कहीं शान्ति नहीं, कहीं परस्पर प्रेम नहीं, सभी अपना धर्म व संस्कार भूल गए हैं।  अपने कर्तव्य को भूल सभी अपना अधिकार चाहते हैं।  नारायण नारायण।
इंद्र: इसका तात्पर्य तो ये है की पृथ्वी पर कोई सुखी नहीं?
नारद: सुखी? नारायण नारायण, सुखी हो भी कैसे प्रभुवर? वहां कुछ ऐसे पथभ्र्ष्ट पुरुष है जो नारी को अपमानित करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। नारायण नारायण
इंद्र: नारी का अपमान कर मानव कभी सुखी नहीं हो सकता। नारी तो महाशक्ति है, जगतजननी है, जब तक वो असुरक्षित है, जगत की सुरक्षा असंभव है। 
रम्भा: प्रभु यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं कुछ निवेदन करूँ।
इंद्र: हाँ हाँ बोलो, बोलो रम्भा बोलो.
रम्भा: ऋषिवर की वाणी सुनकर ऐसी जिज्ञासा जाग उठी है कि स्वर्ग में तो हम नारियां इतनी सुखी व संतुष्ट है पर पृथ्वी पर नारियां इतनी दुखी क्यों हैं? इच्छा होती है कि मैं स्वयं पृथ्वी पर जा कर नारी जाती के कल्याण के लिए कुछ कर सकूँ।
इंद्र: विचार तो अतिउत्तम है, किन्तु तुम्हे मैं तभी वहां जाने की अनुमति दूंगा जब देवर्षि तुम्हारे साथ हो।
नारद: नारायण, नारायण इसी को कहते  हैं- सर मुंडाते ही ओले पड़े. न मैं यहां आता, न जाल में स्वयं फंसता।  किन्तु प्रभु का कथन सर्वथा उचित है. प्रभु , आपकी आज्ञा शिरोधार्य।
इंद्र: तो तुम पृथ्वी पर जा सकती हो रम्भा.
रम्भा: जैसी आपकी आज्ञा प्रभु.
नारद: आप आनंद मनाएं स्वर्ग मैं और हम जाते हैं पृथ्वी का चक्कर लगाने। नारायण, नारायण।
रम्भा: क्या हम इसी वेशभूषा में पृथ्वी का विचरण करेंगें? लोग हम पे आश्चर्य करेंगे।
नारद : आपने सही कहा देवी। चलिए                   

(मंच के पीछे रम्भा का शीघ्रता से वेश परिवर्तन)

दृश्य २:

 डमरू की आवाज, मंच के पीछे से. पृथ्वी का दृश्य।  लोग यहाँ वहां चलते हुए. पीछे से गाड़ियों, बातचीत का शोर। एक कॉलेज के गेट से रम्भा, उसकी सहेली, और दो तीन मनचले लड़के निकलते हुए)

पहला लड़का सीटी बजाते हुए : वो मनचली कहाँ चली  (रम्भा के पीछे आता हुआ)
(रम्भा घबराई सी अपनी सहेली के पीछे छुपती है)
सहेली अपनी चप्पल निकाल कर- जाते हो यहाँ से की मैं १०० डायल करूँ. पता है की नहीं छेड़खानी कानूनन अपराध है।  जेल की हवा खाओगे तो अक्ल ठिकाने आएगी.
दूसरा लड़का: एक ही रास्ता है मेरी परी ,मेरे से शादी रचा लो तो ये छेड़खानी बंद।
पहला लड़का; हाँ, हाँ मेरी रानी, पुलिस मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती , अब मान भी जाओ.
सहेली: सीधे से बात नहीं समझ आती तो मैं तुम्हारी अभी शिकायत दर्ज करती हूँ।( लड़के की आँखों में पीपर स्प्रे करती है) 
पहला लड़का- अरे, इसने तो मेरी आँखों में मिर्ची भर दी. कम्बख्त कही की!
दूसरा लड़का: ये ऐसे नहीं मानेगी।  इसे अपनी सुंदरता का बड़ा घमंड है ( एसिड की बोतल से एसिड सहेली पर फेंक कर भागता है.
(सहेली गिर जाती और पीड़ा से चिल्लाती है, रम्भा भी चिल्ला कर " पकड़ो पकड़ो एसिड फेंक कर वो भाग रहे हैं कोई उनहे पकड़ो )
सहेली- (छटपटाती हुई) हाय, मेरा चेहरा जला दिया। .......
पीछे से आवाज़- जला दिया , जला दिया, चेहरे को जला दिया 
सहेली- मेरे चेहरे को भले ही जलाया, पर मेरे सपने और अरमान नहीं जले, नहीं जले 
पीछे से आवाज़- नहीं जले नहीं जले, सपने, अरमान नहीं जले।
सहेली- हैं मेरे सपने अभी भी साँसें लेती, करुँगी पुरे- मुझे दिलासा देती, मेरे चेहरे को जलाया पर मेरी हिम्मत नहीं जली।
पीछे से आवाज़- हिम्मत है अभी बाकी, हिम्मत है, हिम्मत है - placards flashing anti eve-teasing
( बेख़ौफ़ आज़ाद है रहना मुझे, बेखौफ आज़ाद रहना है मुझे )

डमरू की आवाज़ के साथ दृश्य परिवर्तन

दृश्य ३ 

( सहेली गर्भवती है )
सास- चल, तेरा गर्भ परीक्छण करवाती हूँ।  पता नहीं क्या है- लड़का या लड़की।  डाक्टर साहिबा- जरा अल्ट्रा साउंड कर बताइये न की लड़का है या लड़की?
लेडी डाक्टर- ये क्या फरमा रही हैं? क्या आपको पता नहीं - गर्भ में लिंग निर्धारण करना जुर्म है?
सास और पति ( छुपा के पैसे देते हुए ) - अरे किसी को खबर नहीं होगी- लड़की होगी तो एबॉर्शन करवा देंगे।
रम्भा - ये आप सब क्या कह रहे हैं. (सास से ) आप भी तो कभी किसी की बेटी रही होंगी. (पति से)- और आपको शर्म नहीं आती - क्या अपनी बहनों को, जिनसे राखी बंधवाते हैं - उन्हें उनके जन्म से पहले ही गला घोंट देते?
संतान तो संतान है- बेटा बेटी एक समान है


पीछे से placards on gender determination is illegal- संतान तो संतान है बेटा बेटी एक समान है।

दृश्य ४ - घरेलु हिंसा 

पति - एक तो  खाली हाथों इसके पिता ने मेरे घर भेज दिया और तिस पर इसने बेटी को जन्म दिया? मेरी मर्दानगी पर बट्टा लगा दिया इस करमजली ने. कहाँ से लाऊंगा इसकी पढाई के और शादी के पैसे? कैसे बचाऊंगा इसे समाज की बुरी नज़रों से? 
पत्नी- मेरा इसमें क्या कसूर है जो आप मुझे अपशब्द बोल रहे हैं?
पति- ये देखो इसकी गज भर लम्बी जबान।  
रम्भा- ये क्या आप कह रहे है- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते -, तत्र रमन्ते देवता" अपनी पत्नी- पुत्री के साथ इस  तरह का दुर्व्यवहार!
पति-  आप हमारे फ़टे में टांग न अड़ाए। मेरी पत्नी है मैं चाहे जो करूँ - इसे घर में रखूं या निकाल बाहर करूँ।
चल निकल मेरे घर से।  निकल वो कलमुंही , निकल ( धक्का देता है) 
(पत्नी गिर पड़ती है- हे प्रभु क्या मेरा कोई अस्तित्व , वज़ूद नहीं ?
रम्भा -  चलो बहन , उठो और हिम्मत बटोरों , सुना है नारी सदन में स्त्रियों के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप है जहाँ तुम्हे आश्रय और काम भी मिल जायेगा ताकि तुम अपना व अपनी बेटी का पेट पाल सको, इसे पढ़ा सको.

दृश्य ५ नारी सदन

नारी सदन की अध्यक्षा- लेडीज एंड जेंटलमेन मतलब बहनों और भाइयों ! हमारा नारी सदन इंसाफ मांगता है।  we want justice . अब हम औरतों पर जुल्म नहीं होने देंगें।  हम साफ़ बात बोलता है I speak the truth- जब तक ये मरद लोग हमें बराबरी का दर्जा नहीं देगा हम लोग भी मरद लोग के नाक में दम कर देगा . we believe in women's liberation . ye marad log samajhta kya hai apne aap ko and what do they think of us also?
हम ले के रहेगा अपना रिजर्वेशन एंड राइट।
 पत्नी अंदर जाती है पर दूसरे ही पल वहां से बदहवास भागती है- बचाओ मुझे। यहाँ तो मेरी इज्जत और भी खतरें में है- भूखें नंगे भेड़िये यहाँ भी हैं। मैं कहाँ  जाऊं?
रम्भा- उठो, जागो, मिथक तोड़ो...  द्रौपदी, सहती रहोगी? अब न कोई  कृष्ण  कोई राम।  ये लड़ाई तुम्हे  लड़नी पड़ेगी।  सो उठो, वो देखो क्षितिज पार होने को है नव विहान।


पत्नी- सही कहा तुमने।  हमें न अबला अब समझो।  है आँचल में हमारे दूध अभी भी , और आँखों में है पानी।  पर हम है आज की सबला नारी ।  तुम पर नहीं हम आश्रित , न ही मेरी बेटी किसी पे बोझ. इसे पालूंगी , पढ़ाऊंगी, नौकरी कर या मजदूरी , पर इसके सपनों को दूंगी मैं उड़ान , या  मेरी बेटी न बनेगी किसी पे बोझ.



नेपथ्य से- बेटी न किसी पे बोझ, बेटी न किसी पे बोझ।


घर घर में जब होगा बहू और बेटियों का आदर सम्मान,
समाज में तभी हो पाएगा नारी का समुचित उत्थान।
घर घर में नारी जब कर पाएगी अपने भावों की अभिव्यक्ति ,
तभी पनप पाएगी समाज में अभी तक दबी नारी शक्ति । placards 



रम्भा व नारद -
 चलिए मुनिवर हम स्वर्ग लोक चले यहाँ की नारियां अब जागरूक और सशक्त हो रही  है। अब हमारी यहाँ जरुरत नहीं। 


  दृश्य ४ 

स्वर्ग में -
(बेख़ौफ़ आज़ाद है रहना मुझे................................) रम्भा "बेख़ौफ़ आज़ाद है रहना मुझे" पर धीमी गति से नृत्य करती है। 
इंद्र- आ गए आप सब? और ये क्या- ये आधुनिक वस्त्र में रम्भा और मुनिवर आप? आप सब पृथ्वी पर क्या गए, आप की तो कायापलट ही हो गयी। 
नारद- नारायण नारायण। प्रभु हम तो पृथ्वी लोक की नारियों की गरिमा व चेतना से अभिभूत  हो गए हैं.
रम्भा- हाँ प्रभु- मैं भी उनकी तरह अब जागरूक और सशक्त गयी हूँ। 

इंद्र: ये क्या? अब मेरी सभा क्या होगा? 
नारद, इंद्र से : लीजिये प्रभु, आपने तो अपने पैरों में खुद ही कुल्हाड़ी मार ली। इधर आप अपने इंद्र सभा के मनोरंजन की चिंता करें और उधर मैं जगत की खोज खबर लेता हूँ।  नारायण नारायण......... 


















Thursday, 25 January 2018


आँचल 


12-06-2017
14:57

(आधुनिकिकरण के दौर में कई विलुप्त होते एहसासों- कशीदा किया रूमाल, फाउन्टेन पेन की स्याही से सनी उंगलियाँ, सिलबट्टे की घर्र घर्र, इत्यादि में एक एहसास 'आँचल' तले ममत्व का भी है।) हालांकि 'ममत्व' किसी परिधान का मोहताज नहीं। पर, यूँ ही एक बैठे ठाले की चिंतन 😊 

"आँचल विलुप्त होती तेरी कहानी"-

वह आँचल जीर्ण हो चला और मैं सी भी न सका।
उस विस्तृत आँचल के ओर-छोर को मैं माप भी न सका।

भूख मुझे जब लगती, अपने आँचल से ढक दूध पिलाती।
नींद मुझे जो न आती, आँचल से ढक मीठी लोरी सुनाती।

गरमी जो मुझे लगती, वह अपने आँचल से पंखे झलती।
थक हार जब भी मैं आता, आँचल से मुख मेरा पोंछ देती।

कट फट जो जाता, झट आँचल के कोने से मरहम पट्टी कर देती।
ठंड मुझे जो लगती, आँचल से ढक मेरे तन को गरमी देती।

बीमार जो मैं पड़ता, ईश्वर से आँचल फैला विनती करती।
झगड़ा मैं करता और वो मुझे बचाने आँचल कस खड़ी रहती।

इधर नाक मेरी बहती और उधर आँचल उसकी गंदी होती।
मैं परदेश गया, वो मेरी फोटू आँचल से पोंछ चुम लेती।

वह आँचल जीर्ण हो चला और मैं सी भी न सका,
उस विस्तृत आँचल के ओर- छोर को मैं न माप सका।

आँचल, विलुप्त होती तेरी कहानी...

ONE EYED MONSTERS


One eyed monsters with three hands


05-12-2017

17:27


We used to hear or read a lot about one eyed monsters or ten headed monsters like Ravana in grand mother's bed time stories or in the fairy tales of our childhood days. Those monsters exists in those stories only. In real life, there is no denying that monsters do exists but in different shapes, forms or say Avatars.

While returning from KV Hubbali, the sight of the wind mills on the hills of CHITRADURGA, running parallel along the roads brought back the memories of those bed time stories of one eyed monsters. The only difference I found that these one eyed monsters on the hills of Chitradurga had three hands. The hills seemed to be their domains, of which they were the guards.

 I wondered at the invasion of such image into my mind that suddenly clicked. "What is the resemblance? Who are their enemies? Who they have held captive inside any of the caves there?"The image of bleeding JATAYU, with his wings slashed by RAVANA, just flashed across my mind. These electric generating wind mills  have degenerated nature which once had sheltered birds and animals, have now become the domicile of one eyed monsters with three sword-ridden hands...


Random reflections

1. Wantonly plucked
    Deprives us of colourful joy.
    What nature itself
    Plucks when time comes.

2. A solitary walk
    With ghosts of past
    Never let me revel
    But my lonesome walk.
छोटे शहर की मछली

वह छोटे शहर की मछली है,
बड़े शहर की मछलियों का ग्रास।
पर, उसे निगलना-
उन बड़ी मछलियों के लिए,
है बड़ा ही कठिन, कष्टकर त्रास। 
दिए की लौ जब थी तेज ,
तब भी था तले अँधियारा।
अब तो लौ थरथरा चली ,
अंधियारे की हुई पौ बारह।

Wednesday, 17 January 2018

THE MAN AT THE TRAFFIC SIGNAL

अस्सी में ले लो भैया 

23-12-2017
20:47

"अस्सी में ले लो, ले लो भैया, आज मेरी बेटी का जन्म दिन है, जो देना है इस चश्मे का, दे दो, पर ले लो, सिर्फ तीन ही बचे हैं और मुझे अपनी बेटी के जन्म दिन के लिए पैसे जुटाने हैं...ले लो बाबू, वह मेरी राह तक रही होगी" 
उसकी नजरें उस व्यक्ति पर जा ठहरी। उम्र कुछ खास नहीं, पैंतीस के लगभग होगी पर सर के बाल खिचड़ी हो चले थे। सफेद शर्ट मटमैली हो चली थी और काली पतलून धब्बेदार। सड़क के बीच खड़े सभी स्कूटर-मोटरसाइकिल सवारों से वह बार बार अनुनय विनती कर रहा था। उसकी आटो रिक्शा के पास भी आया। ट्रैफिक सिग्नल अभी हरी नहीं हुई थी। वह चश्मा हाथ में लिए उसके आटो रिक्शा के पास भी आया और अस्सी में ले लो की रट लगाने लगा। वह आटो रिक्शा में आटो चालक के सीट को  साझा कर बैठी हुई थी। उसकी बाकी चारों सहेलियाँ जो उम्र में उससे थोड़ी छोटी थीं, पीछे बैठी थीं। उम्र दराज होने का ये फायदा है। सामाजिक लोक लाज कम महसूस होता है। उसने काले चश्मे में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। अलबत्ता पीछे की सीट पर बैठी उसकी चारों सहेलियों में से एक ने उससे मोल भाव शुरू किया।  बेचारे चश्मे वाले को कुछ खासी जल्दी मच रही थी कि कहीं ट्रैफिक सिग्नल हरी न हो जाए। उसकी सहेली ने उससे पचहत्तर में एक चश्मा देने को कहा और उसने बगैर हील हवाला के एक चश्मा पकड़ाया और पचहत्तर रुपये अपनी जेब में ठूँस लिए। फिर दूसरे अन्य सवारियों की ओर मुखातिब हुआ। इधर ट्रैफिक सिग्नल हरी होने में सिर्फ तीस सेकेंड बचा पा कर उसके चेहरे पर एक अजीब सी  व्याकुलता छा गई। एक मोटर साइकिल सवार के तेज हार्न पर चश्मे वाले ने हड़बड़ा कर अपने पैर को खींच लिया । उसकी नजरें उस चश्मे वाले का पीछा करती रही। चश्मे वाला अपनी अब बेबसी में अपनी भर आती आँखों को अपनी उसी मटमैली कमीज की बाजू से पोंछने का असफल प्रयास करते हुए बड़बड़ाये जा रहा था,"ले लो भैया, दो ही बचे हैं, मेरी बिटिया का जन्मदिन है, मुझे उसके लिए भेंट लेनी है।"
उसकी बेबसी पर उसका मन भर आया। पर, तब तक ट्रैफिक की हरी सिग्नल देखते ही झटके से आटो आगे बढ़ा दी। उसके मुँह से 'बेचारा, किस्मत का मारा लगता है" को सुन आटो वाले के चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान फैल गई। उसे कुछ अटपटा सा लगा। उसने तत्क्षण ही आटो वाले से पूछ डाला,"क्यों भइया, तुम उसे जानते हो क्या? तुम्हारे जान पहचान का है क्या?" 
आटो वाले ने धीमे स्वर में कहा, "इस चश्मे वाले को तो आप रोज ही किसी ना किसी चौराहे पर लोगों को बेवकूफ बनाते हुए पायेंगी। हर रोज़ एक नया किस्सा उसके पास रहता है।" 
उसे बूरा लगा "कैसा असंवेदनशील है, दूसरे की लाचारी का मजाक उड़ाता है!"
पर, प्रकट में इतना ही कहा,"हो सकता है कि उसकी बेटी का सही में जन्मदिन हो।" 
पर, आटो वाले के इस कथन," शाम को अड्डे पर जा कर देखिए, इसके हाथ में चश्मे की बजाये गिलास पाएंगी", ने उसके मुँह पर ताला जड़ दिया।
मस्तक झटक वह सड़क किनारे दुकानों की लाइनों को देखने तो लगी परन्तु मस्तिष्क में उस बेबस चश्मे वाले की अपनी मटमैली कमीज की बाजू से आँखें पोंछती छवि कौंधती रही -"जाने सच क्या रहा होगा? गरीबी की बेबसी या लत की लाचारी?"

Sunday, 6 August 2017


गोलकुंडा 

31-05-2017
18:09

"खंडहर को देख कर कहा जा सकता है कि इमारत कभी बुलंद थी", इस चिरपरिचित कथन की प्रासंगिकता गोलकुंडा किले के सन्दर्भ में शत प्रतिशत लागू होती है। किले की चट्टानी चौड़ी दीवारें अभी भी अन्दर की खंडहरों में तब्दील होती इमारतों की ढाल बन सुरक्षित रखे हुए हैं। जहाँ ऊँची इमारतें की खंडहर हमारे दम्भ, दर्प, अहंकार के खोखलेपन को उजागर करती हैं वहीं बाहरी दीवार जो कि ऊँची हो कर भी जमीं के पास है और सदियों बाद भी सही सलामत हैं, हमें जीवन फलसफा से रूबरू कराती हैं। जो भी हो, किले का हर एक पत्थर एक अनबूझ पहेली है।
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पत्थरों की ऊँची दीवारों से निर्मित
किले की अनगिनत बुर्जों के पीछे
जाने कितने ही किवदंतियाँ, रहस्य है छिपे?

खंडहरों में तब्दील सोये इतिहास का,
बिखरा इक इक पत्थर है गवाह कि
तारीखों के साथ कैसे बदलें तख्त औ'ताज।

एक चरवाहे की पहाड़ी चरागाह को
फौलादी किले से घेर उसकी सुकुनियत पर
हुकूमत का ऐलान करता का ये अवशेष।

दीर्घ चट्टान पर अर्द्धध्वस्त सा वह गुम्बज
राजाओं, शाहों के सर्वोच्च, सर्वोपरि होने के
मान को झुठलाता अब भी है विहँस रहा।

कीलें ठुकी लौह दरवाजे से आबाद,
पर जाने इन बुर्जों से कितनी तोपों ने
अरिसेना पर उगली होगी आग?

जाने सिर्फ दुश्मनों की चढ़ाई की ही या
किसी बेगुनाह की फरियादी तालियों की गूँज
भी पहुंच पायी होगी ताज तले कानों तले?

जाने कितने ही बेजुबान गुलामों के
खून पसीने की नगीनों से सज सज
चमक उठते होंगे बादशाहों के सर के ताज़?

जाने क्या किसी बुर्ज के पीछे से
मंदिरों के घंटों की गूँज मिल किसी और
बुर्ज के आती अजाऩ छेड़ते होंगे नये सुर?

जाने उस ऊँची बुर्ज के कोने से
लौह सलाखों के पीछे जंजीरों में जकड़े
कितनों की आहें घुट बददुआएँ गई बरस?

जाने क्या सूखे इन गहरे हम्मामों में उतरते
रानियों बेग़मों के पाँवों के स्पर्श से शर्मा
हसीन किस्सों को छेड़ने को है आतुर बावलियाँ?

मन में उठते अनगिनत शंकाओं, सवालों पर
जीवन की नश्वरता की अमर छाप लगा
अभेद्य सा खड़ा ये गोलकुन्डा का अजब किला।

जर्रे जर्रे में अनूठे किस्सों को कर महसूस
पर, न छेड़ इन सोये पत्थरों को ऐ सैलानी!
गो कि यहाँ खामोशियाँ करती हैं सरगोशियाँ...
Attachments area
होलिका 

10-03-2017
16:45

कहीं चौराहे पर फिर होलिका जलाने की पुरज़ोर तैयारी हो रही होगी। बच्चों की टोली घर घर जा कर दरवाजे की साँकल पीट पीट कर माँग रहे होंगे - " ए भगवनिया, तोरे सोने के किवड़िया, तोरे चानि के झरोखवा, दूगो लकड़ी द, लकड़ी नइखे त दूगो गोइंठा द।" 
और जब तक उनकी माँगें नहीं पूरी होती, तब तक गाने का सूर क्रमशः तीव्र होता जाता। वो भी क्या दिन थे, 'प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग' से बेखबर...
संवाद 

12-02-2017
11:34

"फ्लाईट में तो ट्रेन से भी ज्यादा झमेला करता है। हमारा एक एक सामान खोल खोल के देखा।
हम भी बोल दिए कि कुछ भी कर लो पर हमारा दवाई इधर से उधर नहीं होना चाहिए। बताओ भला पहिले से चेकइन कईला से का फायदा हुआ, सिकरटी वाला ने टिकिट पर मुहरे नहीं मारा। फिर जा के मुहर लगवा के अपिने लाया। पैसवो लगावो अउरो एतना दिक्कत झेलो, हुँह।"

- बंगलौर-पटना फ्लाईट में उपरोक्त संवाद सुनने में बड़ा ही कर्णप्रिय लगा। कथन की सत्यता को पूर्णतया नकारा भी नहीं जा सकता।
सूखी आँखें 

04-02-2017
20:04

कुछेक वर्ष पहले जब उसकी आँखें कड़ी कड़ी सी रहने लगी थी तो विद्यालय में सबों की आँखों के चेकअप के साथ उसने भी अपनी आँखों का चेकअप करवाया। नेत्र चिकित्सक ने पर्चा लिखा कि आँखें सूख गई हैं और लुब्रिकेटिंग आई ड्राप दो-दो बूंद सुबह शाम डालने को कहा। उसे चिकित्सक की सलाह समझ नहीं आई "उसकी आँखें तो अक्सर गीली रहा करती हैं तो सूखने कैसे लगी? सूखी आंखें होती भला तो आँसू कैसे बहते? और तो और, दो बूंदें भला सूखी आँखों को गीला रखने में कैसे कामयाब होंगी जो आँसूओं के सैलाब न कर सकें?" उसे नेत्र चिकित्सक की योग्यता पर शंका हुई। उधर लुब्रिकेटिंग आई ड्राप कमरे के ताखे पे और इधर उसकी आँखें, दोनों ही सूखते रहें। अलबत्ता एक बात का उसे संतोष अवश्य है कि उसकी आँखें भले ही कड़ी सी हो गई हैं पर नजरों में स्निग्धता है।
पहेली 

22-09-2016
12:05

रात गहराती जाती है उधर
इधर नींद साथ छोड़ जाती है
अनसुलझे प्रश्न, हड़ताली बन,
आँखों की चौखट पर धरना दे बैठते हैं
सुषुप्त मस्तिष्क करती है तब
रात के अंधेरे से सरगोशियाँ ।
पूर्ण विराम 

27-07-2016
22:37

साँसे क्लांत जब चुकने को हों,
स्पंदन थक हार जब थमने को हों,
जीवन पर तब पूर्ण विराम लगा
छेड़ देना मुक्ति राग की तान।

क्षितिज पार है देखो-आतुर,
प्रस्फुटित होने को नव विहान।
04-07-2016
19:16

जाने की घड़ी आ गई।
सोचा नहीं था कि 
यहाँ से जाऊँगी भी कभी।
पर जाने की घड़ी आ गई।

बिताए यहाँ मैंने अपने चालिस के दशक
अब जब पचासवें दशक में आई
तो इसके उत्तरार्ध में
जाने की घड़ी आ गई।

बिताए इन तेरह सालों में
सबके लिए तो जीया ही
खुद से खुद का जब हुआ राबता 
तो जाने की घड़ी आ गई।

कुछ गम के कुछ तम के पल बीते
यहाँ सबके साथ कभी रो के कभी हँस के
जब ठहराव का होने लगा इतमीनान
तो जाने की घड़ी आ गई।

पहले जो जाती तो रहती थी आने की बाट
अबके जो जाऊँगी तो जाने कब आ पाउँगी
इसी ऊहापोह में उलझ सुलझ
अन्तत: जाने की घड़ी आ गई।

किया कई बार जी को कड़ा 
जब भी मन उदास कमजोर पड़ा
आज विदा के इस बेला में मन है नम
कि अब तो बिछड़ने की घड़ी आ गई।

वहाँ जब खोलूंगी लँच का डब्बा तो 
कैसे गले तले उतरेगा निवाला
डबडबाई आँखें के आगे तिर जाएंगे
यहाँ का मिल बाँट साझा खाना।
शायद होगा वहाँ चम चम सा शिक्षक कक्ष
पर आँखें ढूंढेगी तुम्हें
कान तरसेगें तुम्हारे बोल।
न रहेगी वो कुरसी की खींच तान
न साझे का खानपान।
न समवेत स्वर में होगी
अधिकारियों की शिकायतें
न एक साथ किसी शरारती बच्चे पर
मिल कर डाँट फटकार लगाना
कभी कड़वी मीठी नोंकझोंक
कभी चुगली कभी gossiping
याद आ आ मन हो जाएगा उदास
चेहरा घुमा डबडबाई आँखें लुंगी पोंछ
व्याकुल हो तब करूँगी WhatsApp
और facebook तथा फोन पर तुमसे बातें।
यह जानते हुए भी कि शनैः शनै 
स्मृतियाँ होती जाती धूमिल
कुछ नई स्मृति के तले दबती जाती 
फिर जाने की घड़ी है आ जाती।

सो अब जाने की घड़ी आ गई।
सोचा भी न था कि 
यहाँ से जा सकूंगी कभी
पर आज मोह माया से बंधी
यहाँ के मोह माया को छोड़ने की घड़ी है आ चली
सो लेती हूँ अब आप तुम सबों से विदा
कि अब जाने की घड़ी है आ गई।
Dragon fly

23-06-2016
22:16

Dragonfly, dragonfly, 
Where do you come from
Floating by?

Up above from the sky,
Like a helicopter
Hovering bye bye.

Sitting on edge like a Pi,
With your head down 
As if feeling sleepy shy.

Dragonfly dragonfly,
Why do you come 
Floating by?

Inside the bottle you may die, 
Your wings crushed 
Nobody to hear you cry.

Fly free from hands down below,
Sit and spread your tired wings 
On the brow of the rainbow.

Dragonfly, dragonfly!
Can you sing a song for me 
Before I bid you bye bye?
एक मौन संवाद 

30-01-2017
16:23

घर नहीं था वो सिर्फ।
हाड़ माँस का था 
जीता जागता इंसान,
जिससे होती थी बातें
इकतरफा ही सही,
पर वह था मूक श्रोता
और वह एकाकी वक्ता।
वह बोला करती 
और घर सुना करता।
न कहीं प्रतिवाद
न कहीं विवाद
बस इक मौन संवाद।
23-09-2016
08:33

पूरब में किरण उगी है
खेत खलिहान में जा बिखरी है
ओस की बूंदों को सेंक सुखा
अब खिलने खेलने चली है।

पूरब में किरण उगी है
घर के मूंडेरों पर जा बैठी है
खिड़कियों से अंदर झाँक ताक 
अब काम काज करने चली है।

पूरब में धूप खिली है
घरों के छतों पर जा चढी है
सबके सर पर नाच नाच
अब सुस्ताने को चली है।

पूरब में धूप खिली है 
छतों से विसर्पित हो फिसल 
दूर पेड़ों की फुनगियों से 
अब फुसफुसाने को चली है।

पूरब में धूप खिली है
पेड़ की डालों से लटके
झूले पर हल्की पेंगे भर भर 
अब जड़ों के तले सोने चली है।

Sunday, 23 April 2017

MUSINGS

 Walking alone opens up to an aura of smells, sights, people who or which struck some resemblance with the past already registered in your mind and that keeps you lost in the musings that could either be visible in the form of your lips stretching ear to ear in a broad grin or a frown on your forehead. Your mind becomes a curry pot of spicy thoughts. Sometimes you have to slacken your pace as you are confronted with walkers who seems to be birds of same feather flocking together, all moving in a straight horizontal line like partridges leaving you little space , making you glance sideways which way to go and then you have no option to confront this congested traffic of partridges except to step down on the pavement. Sometimes you squeeze your body like a strand of thread through that tiny hole in the needle head to slide out between two or more than two lost friends, meeting after a long gap of time.
Now that there is little time for walking, some of the past musings during the morning walks in the Sanjay Gandhi Botanical Park bring only nostalgia and wistfulness...