यादों, पछतावों, भूलों का ये भंवरजाल,
निगलने को आतुर फाड़े सुरसा सा मुख ,
अंधकूप के अथाह अंधकार से
वो आर्तनाद, करुण क्रंदन,
शुन्य को चीरता वो निस्पंदन,
व्यथा भी खुद से व्यथित,
तब भी तो ना हुई द्रवित.
दुःख सुख के दो अकथित छोर,
जीवन के छिर सागर का मंथन,
किया अमृत औ' गरल का पान,
छलित दमित सारा मान-अभिमान.
अंधकूप से दिखता टुकड़ा सा नीला आसमां,
मन की तृष्णा ने दी बांहें पसार,
चाही कहीं से करुणा व प्रेम उधार,
थाम जो ले चले दूर भवसागर पार.
