Saturday, 11 June 2011

Ye Kaisi Vidambna

ये कैसी विडंबना कि-
यूँ तो लगाते है सभी भारतमाता की जय जयकार
पर उसी भारतमाता की भ्रूण हत्या कर देते हैं उसे चीड़ फाड़.
यूँ तो सरे आम स्त्री शक्ति की लगाते है गुहार,
पर सरे आम ही माँ बहनों की कर देते हैं बलात्कार.
यूँ तो कंधे से कंधे मिला चलने का करते हैं दावा, 
पर हर सीता की अग्नि परीक्षा, द्रौपदी के चीरहरण का फूट पड़ता हैं लावा.   
यूँ तो शक्ति पीठों पर जा चढाते है पुष्पांजलि,
पर उसी शक्ति को दहेजाग्नी में झोंक देते है श्रधांजलि.
गर ये त्रासदी रही पाताल की कालिमा सी अंतहीन,
तब तो हर कलाकार है मो.फ.हुसैन सा घर विहीन.

एक कलाकार की मौत होती है उस युग की मौत-
एक साहित्यकार की मौत होती है उस समाज की मौत-
एक फनकार की मौत होती है उस सदी की मौत -
सो न डालो कला को कटु आलोचना के बंद पिंजर में 
न ही निष्काषित कर कतरों उसके पर 
विचरने दो कल्पना को अंतहीन गगन में 
स्वछन्द, उन्मुक्त निर्भय औ निडर.     

Tuesday, 24 May 2011

Tum Kya Ho

तुम क्या हो? 
तुम अब में तब हो
तुम कहाँ में कब हो
तुम सब में रब हो.

तुम चित्रकार की कूँची हो, 
तुम शुभ्र, सच, शुचि हो,
हर ह्रदय में बसी सुरुचि हो.

तुम कलाकार का सृजन हो,
तुम कवि ह्रदय का गुंजन हो,
तुम नाटककार का मंचन हो.

तुम बांसुरी की मधुर तान हो,
तुम पक्षियों का कलरव गान हो,
तुम नित नवीन विहान हो.

तुम प्रहरी सीमा की जीत हो,
तुम करुण ह्रदय के गीत हो,
तुम निरंतन में अंतर रीत हो.

तुम शिशु की निश्चल मुस्कान हो,
कर्मभूमि के अडिग किसान हो,
सारे अवसादों के अवसान हो.

तुम निराकार में साकार हो,
तुम रण क्षेत्र में धनुष्तंकार हो,
पर हाहाकार में भी शान्ताकार हो,

तुम कण-कण में समाहित हो,
तुम पल-पल में प्रवाहित हो,
इक मधुर निनाद, संगीत हो.

तो, यह न सोचो तुम क्या हो,
तुम हर सोच की इक बयां हो. 

Friday, 20 May 2011

Mujhe Wo Yaad Nahin Banana

  मुझे वो याद नहीं बनाना-
 जो अतीत की दीवारों में चुन दी जाये,
वो गूंज नहीं बनाना -
जो वीराने में विलीन हो जाये,
वो काँच नहीं बनाना-
जो चुभ कर इक टीस दे जाये,
वो तश्वीर नहीं बनाना-
जो दीवार पे धुल की परत पीछे छुप जाये,
वो सूखी पंखूरिया नहीं बनाना-
 जो किताबों के पन्नों के बीच मिले
वो शमा नहीं बनाना-
जो अपने ही परवानो को जला रौशन करे,
वो मोहरा नहीं बनाना-
जो शतरंज की बिसात पे बिछ पिट जाये 
पर, हाँ -
मुझे वो मशाल जरूर बनाना-
जो थकते, गिरते, भटकते क़दमों को इक दिशा दे जाये. 

Monday, 16 May 2011

Chal Gayee Nidra

रात विचारों की जननी है और निद्रा हमारी दिन भर की कठीन मेहनत का पुरस्कार. फिर भी यह निद्रा कभी-कभी  हमसे जिद्दी बच्चे की तरह रूठ जाती है. जितना मनाओ वह उतना ही हमे से दूर भागती जाती है-

आज निद्रा फिर छल कर गयी,
रात बस आँखों में ही कट गयी.

कभी कस्तूरी मृग सी कुलाँचे भरती,
यादोंके गहन वन में खो जाती,
छलावा बन मुझको छल जाती.

कभी तितली सी फूल-फूल पर जा बैठती,
मुठ्ठियों में कैद करना चाही तो कांटे जा चुभे,
आँखों का काजल आंसू के साथ रात्रि की कालिमा में जा मिले.
  

Sunday, 24 April 2011

Pall Of Gloom

I want to sleep through this pall of gloom,
Enveloping me slowly in its demonic doom.

Wake me up, just wake me fast,
At the daybreak from the night past.
In my dream have I heard someone murmur
A call, a step has voiced in my deep slumber.

Let that call and that step stay,
Let my steps pace with that away.
Let my lips whisper back the call,
Let my whisper to him reel and roll.

My steps have started faltering,
My breathe has started fading,
Ah! hold me close unto I breathe my last
Ne'er ever through this world alone I pass

Raktabhit Gulmohar

The red murmur of Summer




प्रचंड होती ज्यों-ज्यों ग्रीष्म चहुओर
त्यों-त्यों प्रखर होता रक्ताभित गुलमोहर, 
नख से शिख अब अमलतास के फूल 
वृक्ष की शाख-शाख पर गए हैं झूल,
वो नव किसलय अब वसंतोप्रांत
है धूल धुसरित और क्लांत,
विकल ह्रदय वर्षा प्रतीक्षित 
आस भरे नयन नभ पे लक्षित,
उठे संध्या में जब मेघ घनघोर 
पवन बहा ले जाती उन्हें छितिज छोर,
प्रकृति के शैशव पर चढ़ा ये यौवन 
गिन रहा अब पतझर के दिन मौन.

Tuesday, 1 March 2011

A Prelude To Spring In My Balcony





 Spring arrived this year with a bounty of new life in my balcony. Though it was a long wait yet a visual treat when a pair of squabs came out of the eggs. It was a sheer delight to see them quivering and cooing. But, a repair work in the kitchen and frequent intrusion of laborers in the balcony on the pretext of getting their tools might have given a fear or insecurity to mother pigeon and to my dismay, one morning, I found them missing. Perhaps, transported by their mother to a much safer haven.