Sunday, 6 August 2017

पहेली 

22-09-2016
12:05

रात गहराती जाती है उधर
इधर नींद साथ छोड़ जाती है
अनसुलझे प्रश्न, हड़ताली बन,
आँखों की चौखट पर धरना दे बैठते हैं
सुषुप्त मस्तिष्क करती है तब
रात के अंधेरे से सरगोशियाँ ।
पूर्ण विराम 

27-07-2016
22:37

साँसे क्लांत जब चुकने को हों,
स्पंदन थक हार जब थमने को हों,
जीवन पर तब पूर्ण विराम लगा
छेड़ देना मुक्ति राग की तान।

क्षितिज पार है देखो-आतुर,
प्रस्फुटित होने को नव विहान।
04-07-2016
19:16

जाने की घड़ी आ गई।
सोचा नहीं था कि 
यहाँ से जाऊँगी भी कभी।
पर जाने की घड़ी आ गई।

बिताए यहाँ मैंने अपने चालिस के दशक
अब जब पचासवें दशक में आई
तो इसके उत्तरार्ध में
जाने की घड़ी आ गई।

बिताए इन तेरह सालों में
सबके लिए तो जीया ही
खुद से खुद का जब हुआ राबता 
तो जाने की घड़ी आ गई।

कुछ गम के कुछ तम के पल बीते
यहाँ सबके साथ कभी रो के कभी हँस के
जब ठहराव का होने लगा इतमीनान
तो जाने की घड़ी आ गई।

पहले जो जाती तो रहती थी आने की बाट
अबके जो जाऊँगी तो जाने कब आ पाउँगी
इसी ऊहापोह में उलझ सुलझ
अन्तत: जाने की घड़ी आ गई।

किया कई बार जी को कड़ा 
जब भी मन उदास कमजोर पड़ा
आज विदा के इस बेला में मन है नम
कि अब तो बिछड़ने की घड़ी आ गई।

वहाँ जब खोलूंगी लँच का डब्बा तो 
कैसे गले तले उतरेगा निवाला
डबडबाई आँखें के आगे तिर जाएंगे
यहाँ का मिल बाँट साझा खाना।
शायद होगा वहाँ चम चम सा शिक्षक कक्ष
पर आँखें ढूंढेगी तुम्हें
कान तरसेगें तुम्हारे बोल।
न रहेगी वो कुरसी की खींच तान
न साझे का खानपान।
न समवेत स्वर में होगी
अधिकारियों की शिकायतें
न एक साथ किसी शरारती बच्चे पर
मिल कर डाँट फटकार लगाना
कभी कड़वी मीठी नोंकझोंक
कभी चुगली कभी gossiping
याद आ आ मन हो जाएगा उदास
चेहरा घुमा डबडबाई आँखें लुंगी पोंछ
व्याकुल हो तब करूँगी WhatsApp
और facebook तथा फोन पर तुमसे बातें।
यह जानते हुए भी कि शनैः शनै 
स्मृतियाँ होती जाती धूमिल
कुछ नई स्मृति के तले दबती जाती 
फिर जाने की घड़ी है आ जाती।

सो अब जाने की घड़ी आ गई।
सोचा भी न था कि 
यहाँ से जा सकूंगी कभी
पर आज मोह माया से बंधी
यहाँ के मोह माया को छोड़ने की घड़ी है आ चली
सो लेती हूँ अब आप तुम सबों से विदा
कि अब जाने की घड़ी है आ गई।
Dragon fly

23-06-2016
22:16

Dragonfly, dragonfly, 
Where do you come from
Floating by?

Up above from the sky,
Like a helicopter
Hovering bye bye.

Sitting on edge like a Pi,
With your head down 
As if feeling sleepy shy.

Dragonfly dragonfly,
Why do you come 
Floating by?

Inside the bottle you may die, 
Your wings crushed 
Nobody to hear you cry.

Fly free from hands down below,
Sit and spread your tired wings 
On the brow of the rainbow.

Dragonfly, dragonfly!
Can you sing a song for me 
Before I bid you bye bye?
एक मौन संवाद 

30-01-2017
16:23

घर नहीं था वो सिर्फ।
हाड़ माँस का था 
जीता जागता इंसान,
जिससे होती थी बातें
इकतरफा ही सही,
पर वह था मूक श्रोता
और वह एकाकी वक्ता।
वह बोला करती 
और घर सुना करता।
न कहीं प्रतिवाद
न कहीं विवाद
बस इक मौन संवाद।
23-09-2016
08:33

पूरब में किरण उगी है
खेत खलिहान में जा बिखरी है
ओस की बूंदों को सेंक सुखा
अब खिलने खेलने चली है।

पूरब में किरण उगी है
घर के मूंडेरों पर जा बैठी है
खिड़कियों से अंदर झाँक ताक 
अब काम काज करने चली है।

पूरब में धूप खिली है
घरों के छतों पर जा चढी है
सबके सर पर नाच नाच
अब सुस्ताने को चली है।

पूरब में धूप खिली है 
छतों से विसर्पित हो फिसल 
दूर पेड़ों की फुनगियों से 
अब फुसफुसाने को चली है।

पूरब में धूप खिली है
पेड़ की डालों से लटके
झूले पर हल्की पेंगे भर भर 
अब जड़ों के तले सोने चली है।

Sunday, 23 April 2017

MUSINGS

 Walking alone opens up to an aura of smells, sights, people who or which struck some resemblance with the past already registered in your mind and that keeps you lost in the musings that could either be visible in the form of your lips stretching ear to ear in a broad grin or a frown on your forehead. Your mind becomes a curry pot of spicy thoughts. Sometimes you have to slacken your pace as you are confronted with walkers who seems to be birds of same feather flocking together, all moving in a straight horizontal line like partridges leaving you little space , making you glance sideways which way to go and then you have no option to confront this congested traffic of partridges except to step down on the pavement. Sometimes you squeeze your body like a strand of thread through that tiny hole in the needle head to slide out between two or more than two lost friends, meeting after a long gap of time.
Now that there is little time for walking, some of the past musings during the morning walks in the Sanjay Gandhi Botanical Park bring only nostalgia and wistfulness...